महात्मा गांधी अपने समीप के धनिकों को 'बारम्बार ट्रस्टीशिप' का उपदेश देते थे। उनका तात्पर्य यह था कि सम्पत्ति का स्वामी अपने को मत मानो, बल्कि यह समझो कि ईश्वर ही सम्पत्ति का स्वामी है और तुम उसकी सुरक्षा और देख-रेख करने वाले ट्रस्टी हो। यह एक अमूल्य उपदेश है। जब मैं अपने को सम्पत्ति का स्वामी मानता हूं, तो उसके व्यय में किसी का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करता, मैं मनमाने खर्च किये जाता हूं।

किसी का अंकुश मुझे अच्छा नहीं लगता। पर यदि मेरे अन्तःकरण में यह भावना बन जाय कि सम्पत्ति के किसी भी अंश का दुरुपयोग न होने पाये। सम्पत्ति पर स्वयं के स्वामित्व की भावना उसे साधारणतया दूसरे के काम में नहीं लगने देती, पर ट्रस्टीशिप का भाव कहता है कि यह सम्पत्ति दूसरों की सेवा के लिए समर्पित है। ट्रस्टी सम्पत्ति को भगवान की थाती के रूप में दुःखियों, पीड़ितों और असहायों की सेवा में लगाकर धन्यता का बोध करता है। विशेषकर, मठ-मन्दिर और सार्वजनिक न्यासों की सम्पत्ति को जो अपनी स्वार्थ-पूर्ति के लिए खर्च करता है, उसे समान निन्दित व्यक्ति और कोई नहीं माना गया।

इस सम्बन्ध में वाल्मीकि रामायण में एक उद्बोधक कथा आती है। एक कुत्ते ने प्रभु राम के दरबार में आकर फरियाद की कि स्वार्थसिद्ध नामक एक ब्राह्मण ने उसके सिर पर अकारण ही प्रहार किया है। उस ब्राह्मण को रामचन्द्रजी के समक्ष प्रस्तुत किया गया। वह बोला-हे राघव, मैं भूखा था। सामने कुत्ते को बैठा देखकर मैंने उससे हटने को कहा। उसके न हटने पर मुझे क्रोध आ गया और मैंने उस पर प्रहार किया। महाराज, मुझसे अवश्य ही अपराध हुआ है, आप मुझे जो चाहें दण्ड दें।

राजा राम ने अपने सभासदों से ब्राह्मण को दण्ड देने के लिये परामर्श किया। सबने एक स्वर से निर्णय दिया-ब्राह्मण को भले ही उच्च कहा गया हो, पर आप तो परमात्मा के महान अंश हैं, अतः आप अवश्य ही उचित दण्ड दे सकते हैं। इस बीच कुत्ता बोला-प्रभो, मेरी इच्छा है कि आप इसे कलिंजर मठ का मठाधीश बना दें। यह सुनकर सबको आश्चर्य हुआ, क्योंकि तब तो ब्राह्मण को भिक्षावृत्ति से छुटकारा मिल जाता और मठाधीश होने के बाद उसे सारी सुख-सुविधाएं प्राप्त हो जातीं। रामचन्द्रजी ने कुत्ते से ब्राह्मण को मठाधीश बनाने का प्रयोजन पूछा। इस पर कुत्ता बोला-हे राजन्! मैं भी पिछले जन्म में कलिंजर का मठाधीश था। मुझे वहां बढ़िया-बढ़िया पकवान खाने को मिलते थे। यद्यपि मैं पूजा-पाठ करता था, धर्माचरण करता था, तथापि मुझे कुत्ते की योनि में जन्म लेना पड़ा। इसका कारण यह है कि जो व्यक्ति देव, बालक, स्त्री और भिक्षुक आदि के लिए अर्पित धन का उपभोग करता है, वह नरकगामी होता है। यह ब्राह्मण अत्यन्त क्रोधी और हिंसक स्वभाव का तो है ही, साथ ही मूर्ख भी है, अतः इसको यही दण्ड देना उचित है।

इस कथा के द्वारा यही बात ध्वनित की गई है कि जो सार्वजनिक सम्पत्ति को अपने ही स्वार्थ के लिए लगाता है, उसकी दशा अन्त में श्वान की जैसी होती है। इसके साथ ही यह बात भी सत्य है कि अपनी सम्पत्ति का भी केवल अपने स्वार्थ के लिए उपयोग मनुष्य को नैतिक दृष्टि से नीचे गिरा देता है। गीता की भाषा में मनुष्य को यह सम्पत्ति प्रकृति के यज्ञ-चक्र से प्राप्त हुई है, अतः उसे उसका उपयोग यज्ञ-चक्र को सुचारु रूप से संचालित होने के निमित्त करना चाहिए। जैसे यदि कहीं पर वायु का अभाव पैदा हो, तो प्रकृति तुरन्त वहां वायु भेज देती है, उसी प्रकार जहां सम्पत्ति का अभाव है, उसकी पूर्ति में जिसके पास सम्पत्ति है, उसका उपयोग होना चाहिए। यही सम्पत्ति के द्वारा यज्ञ-चक्र को पूर्ण बनाना है। इसी को ट्रस्टीशिप कहते हैं। यदि ऐसा न कर व्यक्ति सम्पत्ति का भोग स्वयं करें, तो उसे गीता में स्तेन्य यानी चोर की उपाधि से विभूषित किया गया है।

अपने पास जब आवश्यकता से कुछ अधिक हो जाय, तो उसका समाज के अभावग्रस्त लोगों में वितरण करना अपरिग्रह कहलाता है। यह अपरिग्रह और ट्रस्टीशिप की भावना को जीवन में अंगीकार न किया और तदनुरूप आचरण को न बदला, तो अभावग्रस्त लोगों के हृदय की टीस, उनका विक्षोभ और आक्रोश उनके जीवन को अशान्त और तनावों से युक्त बना देगा।