Tuesday, 07 April 2020, 8:18 AM

उपदेश

विचारों की तरंगें

Updated on 7 April, 2020, 6:00
राजा की सवारी निकल रही थी। सर्वत्र जय-जयकार हो रही थी। सवारी बाजार के मध्य से गुजर रही थी। राजा की दृष्टि एक व्यापारी पर पड़ी। वह चन्दन का व्यापार करता था। राजा ने व्यापारी को देखा। मन में घृणा और ग्लानि उभर आई। उसने मन ही मन सोचा, 'यह... आगे पढ़े

सिद्धांत गौण है, सत्ता प्रमुख

Updated on 2 April, 2020, 6:00
पिछले दिनों में राष्ट्रीय रंगमंच पर जिस प्रकार का राजनीतिक चरित्र उभरकर आ रहा है, वह एक गंभीर चिंता का विषय है। ऐसा लगता है, राजनीति का अर्थ देश में सुव्यवस्था बनाए रखना नहीं, अपनी सत्ता और कुर्सी बनाए रखना है। राजनीतिज्ञ का अर्थ उस नीति-निपुण व्यक्तित्व से नहीं है,... आगे पढ़े

अपनेपन का प्रेम असली प्रेम 

Updated on 31 March, 2020, 6:00
जब प्रेम बहुत गहरा होता है, तब तुम किसी भी गलतफहमी के लिए पूरी जिम्मेवारी लेते हो। पल भर के लिए ऊपरी तौर से नाराजगी व्यक्त कर सकते हो, परन्तु जब इस नाराजगी को दिल से महसूस नहीं करते, तब तुम एक-दूसरे को अच्छी तरह समझ पाते हो। तब तुम... आगे पढ़े

कर्म का फल हैं योनियां 

Updated on 30 March, 2020, 6:00
जीवों में शरीर तथा इन्द्रियों की विभिन्न अभिव्यक्तियां प्रकृति के कारण हैं। कुल मिलाकर 84 लाख भिन्न-भिन्न योनियां हैं और ये सब प्रकृतिजन्य हैं। जीव के विभिन्न इन्द्रिय-सुखों से ये योनिया मिलती हैं जो इस या उस शरीर में रहने की इच्छा करता है। जब उसे विभिन्न शरीर प्राप्त होते... आगे पढ़े

मृत्यु का अर्थ 

Updated on 29 March, 2020, 6:00
मृत्यु एक शात सत्य है। यह अनुभूति प्रत्यक्ष प्रमाणित है, फिर भी इसके संबंध में कोई दर्शन नहीं है।  अब तक जितने ऋषि-महर्षि या संत-महंत हुए हैं, उन्होंने जीवन दर्शन की चर्चा की है। जीवन के बारे में ऐसी अनेक दृष्टियां उपलब्ध हैं जिनसे जीवन को सही रूप में समझा... आगे पढ़े

 अंतर्दृष्टि से अनुबंधित है ज्ञान

Updated on 24 March, 2020, 6:00
बुद्धि अच्छी चीज है, पर कोरी बौद्धिकता ही सब कुछ नहीं है। इससे व्यक्ति के जीवन में नीरसता और शुष्कता आती है। ज्ञान अंतर्दृष्टि से अनुबंधित है, इसलिए यह अपने साथ सरसता लाता है। ज्ञानी व्यक्तियों के लिए पुस्तकीय अध्ययन की विशेष अपेक्षा नहीं रहती। भगवान महावीर ने कब पढ़ी... आगे पढ़े

भगवान की विचारणाएं

Updated on 23 March, 2020, 6:00
जब मनुष्य इस जिम्मेदारी को समझ ले कि मैं क्यों पैदा हुआ हूं और पैदा हुआ हूं तो मुझे क्या करना चाहिए? भगवान द्वारा सोचना, विचारना, बोलना, भावनाएं आदि अमानतें मनुष्य को इसलिए नहीं दी गई हैं कि उनके द्वारा वह सुख-सुविधाएं या विलासिता के साधन जुटा अपना अहंकार पूरा... आगे पढ़े

प्रार्थना की पुकार

Updated on 22 March, 2020, 6:00
यदि प्रार्थना सच्ची हो तो परमपिता परमेश्वर उस प्रार्थना को जरूर ही सुनते हैं। परमपिता परमेश्वर अत्यंत कृपालु और दयालु हैं, परंतु प्रार्थना के लिए भी हृदय का पवित्र और निर्मल होना अत्यंत आवश्यक है। मन का पवित्र होना, अहंकार और अभिमान से रहित होना नितांत आवश्यक है। ऐसे पवित्र-हृदय-अंतŠ... आगे पढ़े

 विवेक ही धर्म है 

Updated on 21 March, 2020, 6:00
युग के आदि में मनुष्य भी जंगली था। जब से मनुष्य ने विकास करना शुरू किया, उसकी आवश्यकताएं बढ़ गई। आवश्यकताओं की पूर्ति न होने से समस्या ने जन्म लिया। समस्या सामने आई तब समाधान की बात सोची गई। समाधान के स्तर दो थे- पदार्थ-जगत, मनो-जगत. प्रथम स्तर पर पदाथरे... आगे पढ़े

 धर्म क्या है?

Updated on 20 March, 2020, 6:00
धर्म के मुख्यत:  दो आयाम हैं। एक है संस्कृति, जिसका संबंध बाहर से है। दूसरा है अध्यात्म, जिसका संबंध भीतर से है। धर्म का तत्व भीतर है, मत बाहर है। तत्व और मत दोनों का जोड़ धर्म है। तत्व के आधार पर मत का निर्धारण हो, तो धर्म की सही... आगे पढ़े

नित अभ्यास से दर्शन कर सकते हैं ईश्वर का

Updated on 18 March, 2020, 6:00
सभी शास्त्र  कहते हैं कि बिना भगवान को प्राप्त किये मुक्ति नहीं मिल सकती है। इसलिए भगवान की तलाश के लिए कोई व्यक्ति मंदिर जाता है तो कोई मस्जिद, कोई गुरूद्वारा, तो कोई गिरजाघर। लेकिन इन सभी स्थानों में जड़ स्वरूप भगवान होता है। अर्थात ऐसा भगवान होता है जिसमें... आगे पढ़े

ईश्वर को पाने के लिए प्रेम मार्ग से गुजरना होगा 

Updated on 17 March, 2020, 6:00
प्रेम शक्ति भी है और आसक्ति भी। जब व्यक्ति का प्रेम कामना रहित होता है तो यह शक्ति होती है और जब प्रेम में किसी चीज को पाने का लोभ रहता है तो यह आसक्ति बन जाती है। सच्चा प्रेम वह होता है जो प्रेम में किसी प्रकार का लोभ... आगे पढ़े

एक प्रवाह है जीवन 

Updated on 15 March, 2020, 6:00
जीवा एक प्रवाह है। वह रुकता नहीं, बहता रहता है। जो बहता है, वही प्रवाह होता है। जिसमें ठहराव है, गतिहीनता है, वह प्रवाह नहीं हो सकता। प्रवाह स्वच्छता का प्रतीक है, जबकि ठहराव में गंदगी की संभावना बनी रहती है। प्रवाह में जीवनी शक्ति है, जबकि ठहराव में अस्तित्व... आगे पढ़े

इच्छा का लक्ष्य है खुशी 

Updated on 13 March, 2020, 6:00
बुरी आदत को छोड़ने की असमर्थता तुम्हें तकलीफ देती है। जब तुम बहुत पीड़ित होते हो, वह व्यथा तुम्हें उस आदत से छुटकारा दिलाती है। जब तुम अपनी कमियों से व्यथा महसूस करते हो, तब तुम साधक हो। पीड़ा तुम्हें आसक्ति से दूर करती है। यदि अपने दुर्गुणों को हटा... आगे पढ़े

रोजाना करें इन वैदिक मंत्रो का जाप, पाए सभी मुसीबतों से छुटकारा

Updated on 11 March, 2020, 6:30
इस व्यस्त दुनिया में सभी को सुख, शान्ति, समृद्धि और वैभव की कामना होती है. लोग इसके लिए बहुत से ध्यान, यग और पाठ भी करते हैं. लेकिन कुछ ऐसे भी मंत्र हैं जिनका रोज सच्चे मन से उच्चारण करने से मन को तो शांति मिलती ही हैं साथ ही... आगे पढ़े

इसलिए रह जाती है पूर्व जन्म की स्मृतियां 

Updated on 10 March, 2020, 6:00
माना जाता है कि संसार में हम जो भी काम करते अथवा बोलते हैं वह एक उर्जा के रूप में प्रकृति में वर्तमान रहती है। उर्जा के विषय में विज्ञान कहता है कि उर्जा कभी नष्ट नहीं होती है। इसका स्वरूप बदलता रहता है। हमारी आत्मा भी उर्जा का ही... आगे पढ़े

तुम्हारी सम्पदा है निष्ठा  

Updated on 8 March, 2020, 0:00
यदि तुम सोचने हो कि ईश्वर में तुम्हारी निष्ठा ईश्वर का कुछ हित कर रही है, तो यह भूल है। ईश्वर या गुरु में तुम्हारी निष्ठा ईश्वर या गुरु का कुछ नहीं करती। निष्ठा तुम्हारी सम्पदा है। निष्ठा तुम्हें बल देती है। तुममें स्थिरता, केंद्रीयता, प्रशांति और प्रेम लाती है।... आगे पढ़े

जीवन और मृत्यु 

Updated on 7 March, 2020, 6:00
चीन में लाओत्से के समय में ऐसी प्रचलित धारण थी कि आदमी के शरीर में नौ छेद होते हैं। उन्हीं नौ छेदों से जीवन प्रवेश करता है और उन्हीं से बाहर निकलता है। दो आंखें, दो नाक के छेद, मुंह, दो कान, जननेंद्रिय, गुदा। इसके साथ चार अंग हैं- दो... आगे पढ़े

हर जीव में व्याप्त नारायण 

Updated on 6 March, 2020, 6:00
वैदिक साहित्य से हम जानते हैं कि परम-पुरुष नारायण प्रत्येक जीव के बाहर तथा भीतर निवास करने वाले है। वे भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों जगतों में विद्यमान हैं। यद्यपि वे बहुत दूर हैं, फिर भी हमारे निकट हैं-आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतरू हम भौतिक इन्द्रियों से न तो उन्हें... आगे पढ़े

विवेक ही धर्म है 

Updated on 4 March, 2020, 6:00
युग के आदि में मनुष्य भी जंगली था। जब से मनुष्य ने विकास करना शुरू किया, उसकी आवश्यकताएं बढ़ गई। आवश्यकताओं की पूर्ति न होने से समस्या ने जन्म लिया।समस्या सामने आई तब समाधान की बात सोची गई। समाधान के स्तर दो थे- पदार्थ-जगत, मनो-जगत. प्रथम स्तर पर पदार्थ के... आगे पढ़े

 सफलता चाहिए तो पहले ये सीखें

Updated on 3 March, 2020, 6:00
किसी भी काम में लगन का अपना महत्व होता है, सफलता आपकी एकाग्रता पर ही निर्भर करती है। आप संसार को पाने की दौड़ में हो या परमात्मा को, जब तक हम ध्यान लगाकर काम नहीं करेंगे कभी ठीक परिणाम नहीं मिलेगा। इसके लिए जरूरी है कि आप पहले अपने... आगे पढ़े

न देने वाला मन 

Updated on 2 March, 2020, 6:00
एक भिखारी सुबह-सुबह भीख मांगने निकला। चलते समय उसने अपनी झोली में जौ के मुट्ठी भर दाने डाल लिए। टोटके या अंधविश्वास के कारण भिक्षाटन के लिए निकलते समय भिखारी अपनी झोली खाली नहीं रखते। थैली देख कर दूसरों को लगता है कि इसे पहले से किसी ने दे रखा... आगे पढ़े

व्यवहार से ही मिल गया सवाल का जवाब

Updated on 1 March, 2020, 6:00
एक दार्शनिक समस्याओं के अत्यंत सटीक समाधान बताते थे। एक बार उनके पास एक सेनापति पहुंचा और स्वर्ग-नर्क के विषय में जानकारी चाही। दार्शनिक ने उसका पूर्ण परिचय पूछा तो उसने अपने वीरतापूर्ण कार्यो के बारे में सविस्तार बताया। उसकी बातें सुनकर दार्शनिक ने कहा - शक्ल-सूरत से तो आप... आगे पढ़े

दु:खी होने की बजाय दुख का उपचार करें 

Updated on 24 February, 2020, 6:00
लोगों से अपने सुना होगा कि संसार में दु:ख ही दु:ख है। असफलता मिलने पर कई बार आप भी यही सोचते होंगे, जबकि वास्तविकता इससे भिन्न है। संसार में दु:ख इसलिए है क्योंकि संसार में सुख है। अगर सुख नहीं होता तो दु:ख का अस्तित्व भी नहीं होता है। ईश्वर... आगे पढ़े

 कहीं आप भी पाप की पूंजी तो जमा नहीं कर रहे 

Updated on 23 February, 2020, 6:00
क्या आपने कभी किसी के ऊपर हो रहे अत्याचार के विरूद्ध आवाज उठायी है। किसी कमज़ोर और लाचार को पिटता देखकर मदद के लिए आगे आएं हैं। अगर आपने ऐसा नहीं किया है तो समझ लीजिए आपने अपने खाते में पाप की पूंजी जमा कर ली है। शाŒााW में जिस... आगे पढ़े

शरीर तो मंदिर है

Updated on 22 February, 2020, 6:00
आस्तिकता और कर्त्तव्यपरायणता की सद्वृत्ति का प्रभाव सबसे पहले सबसे समीपवर्ती स्वजन पर पड़ना चाहिए। हमारा सबसे निकटवर्ती सम्बन्धी हमारा शरीर हैं। उसके साथ सद्व्यवहार करना, उसे स्वस्थ और सुरक्षित रखना अत्यावश्यक है। शरीर को नर कहकर उसकी उपेक्षा करना अथवा उसे सजाने-संवारने में सारी शक्ति खर्च कर देना, दोनों... आगे पढ़े

 इसलिए सबसे छोटा है कलियुग 

Updated on 20 February, 2020, 6:00
शास्त्रों में सृष्टि के आरंभ से प्रलय काल तक की अवधि को चार युगों में बांटा गया है। वर्तमान में हम जिस युग में जी रहे हैं उसे कलयुग कहा गया है। इससे पहले तीन युग बीत चुके हैं सतयुग, त्रेता और द्वापर। भगवान श्री राम का जन्म त्रेतायुग में... आगे पढ़े

 ईश्वर हमेशा भक्तों की सहायता करता है

Updated on 19 February, 2020, 6:00
ईश्वर को हम भले ही न देख पाएं लेकिन ईश्वर हर क्षण हमें देख रहा होता है। उसकी दृष्टि हमेशा अपने भक्तों एवं सद्व्यक्तियों पर रहती है। अगर आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि जीवन में कभी न कभी कठिन समय में ईश्वर स्वयं आकर आपकी सहायता कर चुके हैं।... आगे पढ़े

प्रभु भक्ति में बीते समय 

Updated on 18 February, 2020, 6:00
यह भौतिक जगत प्रकृति के गुणों के चमत्कार के अन्तर्गत कार्य कर रहा है। मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी चेतना कृष्ण कार्य में लगाए। कृष्णकार्य भक्तियोग के नाम से विख्यात हैं। इसमें न केवल कृष्ण अपितु उनके विभिन्न पूर्णाश भी सम्मिलित हैं- यथा राम तथा नारायण। कृष्ण के असंख्य... आगे पढ़े

 उत्तम शरण है धर्म  

Updated on 17 February, 2020, 6:00
धर्म के बारे में भिन्न-भिन्न अवधारणाएं हैं। कुछ जीवन के लिए धर्म की अनिवार्यता को स्वीकार करते हैं। कुछ लोगों का अभिमत है कि धर्म ढकोसला है। वह आदमी को पंगु बनाता है और रूढ़ धारणाओं के घेरे में बंदी बना लेता है। शायद इन्हीं अवधारणाओं के आधार पर किसी... आगे पढ़े